Sunday, November 25, 2007

क्यों नहीं रह सकतीं तसलीमा हमारे यहां


आजकल तसलीमा नसरीन को लेकर देश में हंगामा मचा है। राज्य सरकारों से लेकर केन्द्र तक उनको पनाह देने से बच रहा है। उनके साथ ऐसा व्यवहार किया जा रहा है मानो वह कोई अपराधी हों। तसलीमा लंबे समय से यहां रह रही हैं। भारत के लोग उनकी लेखनी से भलीभांति परिचित हैं। किसी लेखक के विचारों से सहमत होना या असहमत होना तो हमारा अधिकार है। लेकिन अचानक ऐसा क्या हो गया कि पश्चिम बंगाल सरकार को तसलीमा को कोलकाता छोडने के लिए कहना पड़ा। बंगाल के बाद राजस्थान सरकार और अब केन्द्र भी उन्हें सुरक्षा देने से कतरा रहा है। केन्द्र चाहता है कि तसलीमा भारत छोड़कर विदेश चली जाएं। आखिर ऐसी क्या मजबूरी आन पड़ी की कि केन्द्र सरकार उन्हें देश से बाहर का रास्ता दिखाने पर तुली है।
क्या हमारा देश भी कटृटरपंथ की राह पर चल पड़ा है। क्या हम एक लेखिका को सिर्फ इसलिए देश निकाला देना चाहते हैं कि उसने ऐसा कुछ लिख दिया जो हमें ठीक नहीं लगा। जिन्हें तसलीमा की लेखनी पर आपत्ति है तो वे उनके खिलाफ लिखकर उनका विरोध कर सकते हैं। फतवा जारी कर अपनी राय थोपना तो हमारी तहजीब नहीं। वैसे आज मौका तसलीमा की लेखनी पर बहस करने का नहीं बल्कि यह सोचने का है कि क्या हम इतने कमजोर हो चले हैं कि एक लेखिका की सुरक्षा की जिम्मेदारी नहीं संभाल सकते। तसलीमा बार-बार कह रही हैं कि वह कोलकाता को अपना घर समझतीं हैं और वहीं रहना चाहती हैं। मैं बांग्ला लेखिका महाश्वेता देवी की इस बात से पूरी तरह सहमत हूं कि तसलीमा को भारत की नागरिकता मिलनी चाहिए।
धर्मनिरपेक्षता का दम भरने वाली माकपा आज चाहे जितने बहाने कर ले लेकिन देश की जनता उसकी हकीकत जान चुकी है। हम सब समझते हैं कि नंदीग्राम मसले पर चारो तरफ से घिरी पश्चिम बंगाल सरकार को सिर्फ राज्य के 27 प्रतिशत अल्पसंख्यक वोटों की चिंता है। कुछ सिरफिरे अल्संख्यकों की जिद पर तसलीमा को कोलकाता छोड़ने का फरमान जारी कर माकपा ने अपने खोखलेपन का सबूत दे दिया है। इस मसले पर केन्द्र का रवैया तो और भी दुखद है। सबको सिर्फ और सिर्फ मुस्लिम वोटों की फिक्र है। राजनीति के दलदल में छटपटाती पार्टियों से यह उम्मीद करना भी बेमाने है कि वे निजी संकीर्णता से उपर उठकर देश की छवि के बारे में सोचेंगी। तसलीमा को विदेश जाने की सलाह देकर केन्द्र सरकार दुनिया को क्या संदेश देना चाहती है। क्या हम दुनिया को यह बताना चाहते हैं कि हम कटटरपंथियों की धमकियों से डरकर फैसले करते हैं या फिर हमने नैतिक साहस खो दिया है और हमारा विशाल सुरक्षा अमला एक लेखिका की जान की हिफाजत करने में असक्षम है।

मीना त्रिवेदी

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